Sunday, 31 January 2016

Nutrition Facts and Analysis for Sesame Seeds : तिल के चमत्कारी गुण : जानिए तिल के अनमोल फायदे |


                                         Nutrition Facts and Analysis for Sesame Seeds   

भारत में कई डिशेज़ में तिल को स्वाद बढ़ाने के लिए डाला जाता है। मीठा हो या नमकीन, तिल हर डिश में बेस्ट लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जितना इसमें स्वाद है, उससे कहीं ज्यादा यह सेहत के लिए फायदेमंद है ? जी हां, आज हम आपको इसी तिल के ऐसे फायदे बता रहे हैं, जो आपके शरीर को मज़बूत बनाते हैं। तिल का तेल भी बहुत फायदेमंद होता है, इसके प्रयोग से कई गंभीर बीमारियां दूर हो जाती हैं| 
तिल में ओलिक एसिड भरपूर मात्रा में होता है। यह मोनो सैचुरेटेड फैटी एसिड का एक पोटेंट होता हैजो बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। साथ हीगुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है। इससे शरीर में हेल्दी लिपिड (वसा) बना रहता है। इस वजह से यह दिल संबंधी बीमारियों से भी प्रोटेक्ट करता है। तिल कैंसर से प्रोटेक्ट करता हैएंग्ज़ाइटी को कम करता हैबच्चों की हड्डियां हेल्दी होती हैंप्रेग्नेंसी में भी फायदेमंदस्ट्रोक के बाद रिकवर करेबेबी के लिए भी है बेस्ट | 
तिल तीन प्रकार के होते हैं और हर प्रकार के तिल के अलग-अलग लाभ होते हैं | आज हम आपको तिल के कुछ अन्य लाभों के बारे में बताएँगे , हम आशा करते हैं की इससे आपको कुछ लाभ होगा-

        तिल के प्रयोग से होने वाले कुछ अन्य लाभ :                                                                         

[सौंदर्य प्रसाधन के रूप में: तिल का तेल सिर पर लगाने से बाल बढ़ने लगते हैं।
[याददास्त कमजोर हो जाने पर: तिल और गुड़ को बराबर मात्रा में मिलाकर लड्डू बना लें। इसे रोजाना सुबह और शाम खाकर ऊपर से दूध पीने से दिमाग की कमजोरी के साथ ही साथ मानसिक तनाव भी दूर हो जाता है।
[विनसेण्ट एनजाइना के रोग में: शुद्ध कुसुम के असली तेल को तिल के तेल में मिलाकर गले में लगाने से इस रोग में आराम मिलता है।
[श्वेत प्रदर में: तिल के तेल में रूई के फोहे को भिगोकर योनि में रखने से श्वेत प्रदर ठीक हो जाता है।
[हृदय रोग में: लगभग 10 मिलीलीटर तिल के तेल, 1 ग्राम नमक  तथा 15 से 30 मिलीलीटर दशमूल ( श्योनाक, बेल, खंभारी, अरलू, पाढ़ल, सरियवन, पिठवन, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी और गिलोय) का काढ़ा मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से लाभ मिलता है।
[कुल्हे से पैर तक दर्द होना (साइटिका रोग) में: कुल्हे से पैर तक दर्द हो तो 50 मिलीलीटर तिल के तेल में 10 लहसुन की पुती को छीलकर गर्म करें। फिर उसे उतारकर ठंडा करके उससे मालिश करने से आराम मिलता है।
[हिस्टीरिया में: तिल, घृत कुमारी और नारियल के ठंडे तेल को मिलाकर सिर पर मालिश करने से हिस्टीरिया ठीक होने लगता है।
[नाखून का जख्म होने पर: नाखून का जख्म अगर नाखून के फटने से हो तो उसके लिए 20 मिलीलीटर तिल का तेल, 10 मिलीलीटर सिरका और 5 ग्राम सरसों पिसी हुई मिलाकर गर्म करके मलहम बनाकर लगाने से नाखूनों का जख्म ठीक हो जाता है।
[कुष्ठ (कोढ़) रोग में: 6 ग्राम निर्गुण्डी की जड़ के चूर्ण को तिल के तेल में मिलाकर 1 महीने तक खाने से कुष्ठ रोग ठीक हो जाता है।
[गुर्दे में जलन होने पर: तिल का तेल और नीम का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर गुदा पर लगायें। इससे गुदा पाक का प्रदाह (जलन) तथा जख्म मिट जाते हैं।
[जीभ और मुंख का सूखापन : तिलका की छाल चबाने से मुंह का सूखापन खत्म होता है। इसके प्रयोग से लार ग्रंथि की श्राव बढ़ती है।
[स्तनों का जमा दूध निकालने में: काले तिलों को दूध या पानी में पीसकर हल्का गर्म करें और इससे पीड़ित स्त्रियों की छाती पर लेप करें। इससे छाती (सीने) का जमा हुआ दूध निकल जाता है।
[सिर की रूसी में: तिल का तेल लगाने से रूसी खत्म हो जाती है।
[गर्भ को सुदृढ़ (मजबूत) करने के लिए: धुले हुए तिल और जौ 20-20 ग्राम की मात्रा में कूट-छानकर इसमें लगभग 40 ग्राम की मात्रा में खांड मिलाकर रख दें, फिर इसकी 5 ग्राम की मात्रा सुबह शहद के साथ सेवन करने से गर्भ सुदृढ़ होता है।
[पेट में गैस बनना: आधा चम्मच काले तिल, थोड़ा-सा कपूर, एक लाल इलायची, आधा चम्मच अजवाइन, 2 चुटकी काला नमक को मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को गुनगुने पानी के साथ पीने से पेट की गैस खत्म हो जाती है।
[मुंह का रोग: सरसों का तेल, सफेद तिल, लोंग 5-5 ग्राम की मात्रा में मिलाकर मोटा-मोटा कूट लें। फिर इस कूटन को 150 मिलीलीटर पानी में उबालें, जब यह एक चौथाई रह जाए तब इसे छानकर इसमें आधी चम्मच शहद मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से मुंह से लार गिरना बंद हो जाता है।
[भगन्दर होने पर: तिल, एरण्ड की जड़ और मुलहठी को 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर थोड़े-से दूध के साथ पीसकर भगन्दर पर लेप करने से रोग में आराम मिलता है।
[प्रदर रोग में: तिल को पीसकर चूर्ण बनाएं। इसमें से 10 ग्राम चूर्ण शहद में मिलाकर खाने से प्रदर में लाभ मिलता है।
[प्रथम महीने गर्भ के विकार में: तिल पदमाख, कमलकंद और शालि चावल (सेल्हा चावल) समान मात्रा में लेकर गाय के दूध के साथ पीसें और उसे शहद और मिश्री युक्त गाय के दूध में गर्भवती स्त्री को घोलकर पिलाने से प्रथम महीने होने वाले गर्भ के विकार नष्ट हो जाते हैं।
[माहवारी को प्रारम्भ करने के लिए: तिल, सोंठ, मिर्च, पीपल, भारंगी, तीन वर्ष पुराना गुड़ सभी को मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से रजोदर्शन (माहवारी) होना शुरू हो जाता है।
[मधुमेह (शुगर) में: लगभग 15 से 20 ग्राम काले तिल और इसी के बराबर मात्रा में गुड़ लेकर दोनों को मिलाकर रोजाना सेवन करने से मधुमेह ठीक हो जाता है।
[मोटापा कम करने में: तिल के तेल की मालिश करने से शरीर पर चढ़ी फालतु की चर्बी कम होने लगती है।
[कील या कांटे के चुभने पर: जब कांटा चुभ गया हो तो उसे सुई से कुरेदकर निकालने का प्रयास न करें। कांटा निकालने के लिये तिल के तेल में नमक मिलाकर रूई भिगोकर कांटे लगे स्थान पर इसे रखकर ऊपर से पट्टी बांध लें। इससे कुछ ही समय में कांटा निकल जाएगा।
[सभी प्रकार के दर्द में: तिलों को बारीक पीसकर गोला बनाकर पेट पर लगाने से `वातज शूल´ यानी वात के कारण होने वाले दर्द में लाभ मिलता है।
[टीके से होने वाले दोष में: 240 से 960 मिलीलीटर तिल के रस को छाछ (लस्सी) के साथ सुबह-शाम सेवन करने से टीका पकने के कारण बना घाव ठीक हो जाता है।
[अरूंषिका (वराही) में: तिलों को कूटकर और मुर्गे की बीट को गाय के पेशाब के साथ पीसकर सिर पर लगाने से अरुंषिका रोग या छोटी-छोटी फुंसियां ठीक हो जाती है।
[एक्जिमा (पामा) में: 1 मिलीलीटर तिल के तेल में 250 ग्राम कनेर की जड़ को जलाकर, तेल को छानकर रख लें। इस तेल को रोजाना साफ रूई से एक्जिमा पर सुबह और शाम लगाने से एक्जिमा ठीक हो जाता है।
[अपरस में: काले तिल और बावची को बराबर मात्रा मे मिलाकर चूर्ण बना लें। इसमें से 10 ग्राम चूर्ण को सुबह और शाम खाने से खून साफ हो जाता है और अपरस ठीक हो जाता है।
[स्त्री रोग में: लगभग 6-12 ग्राम काले तिलों का चूर्ण गुड़ के साथ सुबह और शाम लेने से स्त्री रोग में लाभ मिलता है।
[गुल्म ( पकने वाला फोड़ा) में: 8 ग्राम काले तिल, 2 ग्राम सोंठ और 4 ग्राम गुड़ के मिश्रण को गर्म दूध के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से लाभ होता है।
[चिप्प (कुनख): लगभग 10 ग्राम तिल के तेल में 10 ग्राम हल्दी का चूर्ण मिलाकर लेप बना लें। इस लेप लगाने से चिप्प ठीक हो जाता है।
[अंडकोष की सूजन में: 25 ग्राम काले तिल में 25 ग्राम एरण्ड के बीजों की गिरी को एक साथ पीसकर अंडकोष पर लगाकर इस पर एरण्ड के पत्ते रखकर पट्टी बांध लें। इससे सूजन कम हो जाती है।
[दमा (श्वास) में: सर्दी के महीने में तिल-गुड़ के लड्डू या गजक का सेवन करते रहने से दमा रोग नष्ट हो जाता है।
[आमवात, सन्धिवात (जोड़ों के दर्द) में: लगभग 4 ग्राम तिल और सोंठ का मिश्रण दिन में दो बार सेवन करने से आमवात में लाभ मिलता है।
[मर्दाना ताकत के लिए (पुरुषार्थ): तिल और अलसी का 100 मिलीलीटर काढ़े को सुबह और शाम भोजन से पहले सेवन करने से मर्दाना ताकत बढ़ती है।
[सूजाक (गिनोरिया) में: ताजे तिल के पौधे को 12 घंटे तक पानी में भिगोकर उस पानी को पीने या तिल के 5 मिलीलीटर रस को दूध या शहद के साथ देने से पेशाब में जलन ठीक हो जाती है तथा पेशाब साफ आता है।
[मुंहासे: तिलों की छाल को सिरके के साथ पीसकर चेहरे पर लगाने से मुंहासे ठीक हो जाते हैं।
[मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट या जलन): 1 से 2 ग्राम तिल के तने का रस दही के पानी के साथ दिन में 2 बार लेना चाहिए। इससे मूत्रकृच्छ नष्ट हो जाता है।
[प्रवाहिका (पेचिश) में: 6 से 12 ग्राम तिल और कच्चे बेल के गूदे का मिश्रण दिन में सुबह और शाम लेने से लाभ होता है।
[आंखों के रोग में: काले तिलों का ताजा तेल रोजाना सोते समय आंखों में डालते रहने से अनेक प्रकार के आंखों के रोग ठीक हो जाते हैं।
[नारू (बाला) में: तिल को खली में पीसकर लेप करने से नारू मिट जाता है।
[फोड़े-फुंसियां होने पर: 100 मिलीलीटर तिल के तेल में भिलावे मिलाकर पकाएं जब यह जल जाए तो इसमें 30 ग्राम सेलखड़ी को पीसकर मिला दें। इसका उपयोग फोड़ें-फुंसियों पर लगाने से लाभ मिलता है।  इसके उपयोग से हर प्रकार के जख्म ठीक हो जाते हैं। इसको लगाने के लिए मुर्गी के पंख का उपयोग करना चाहिए।

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